aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bator"
बात है तो कुछ ऐब सीलेकिन फिर भी हैहो गई थी मोहब्बतएक मर्द कोएक सुनहरी मछली सेलहरों से अटखेलियाँ करतीबल खाती चमचमाती मछलीभा गई थी मर्द कोटुकटुकी बाँधे पहरोंदेखता रहता वोउस शोख़ की अठखेलियाँमछली को भी अच्छा लगता थामर्द का इस तरह से निहारनाबंध गए दोनों प्यार के बंधन मेंमिलन की ख़्वाहिश फ़ितरी थीमर्द ने मछली से इल्तिजा कीएक बार सिर्फ़ एक बारपानी से बाहर आने की कोशिश करोमोहब्बत का जुनूनइतना शदीद था किबग़ैर कुछ सोचे-समझेमछली पानी से बाहर आ गईछट-पटा गईबहुत बरी तरह से छट-पटा गईलेकिन अबवो अपने महबूब की बाँहों में थीमोहब्बत की कैफ़ियत मेंकुछ पल कोसारी तड़प सारी छट-पटाहट जाती रहीदो बदन इक जान हो गएसैराब हो कर महबूब नेमहबूबा को पानी के सुपुर्द कर दियाबड़ा अनोखा बड़ा मसर्रत-अंगेज़और बड़ा दर्दनाक था ये मेलहर बार पूरी ताक़त बटोर करचल पड़ती महबूबामहबूब से मिलनेतड़फड़ाती छट-पटातीप्यार देती प्यार पातीसैराब करती सैराब होतीऔर फिर लौट आती पानी मेंएक दिनमछली को जाने क्या सूझीउस ने मर्द से कहाआज तुम आओमैं पानी में कैसे आऊँकुछ पल अपने साँसें रोक लोमछली ने कहासाँस रोक लूँया'नी जीना रोक लूँकुछ पल जीने के लिए ही तो आता हूँ मैंतुम्हारे पाससाँस रोक लूँगा तो जियूँगा कैसेमर्द ने कहामछली सकते में थीएक ही पल में:मर्द की फ़ितरत और मोहब्बत केबाहमी रिश्ते की सच्चाईउस के सामने थीअबकुछ जानने पाने और चाहने कोबाक़ी नहीं बचा थामछली ने बे-कैफ़ निगाहों सेमर्द को देखाऔर डूब गईबे-पनाह गहराइयों मेंउधर ख़ुद से बे-ख़बर मर्दजीने की ख़्वाहिश लिए अभी तक वहीं बैठा हैऔर सोच रहा है मेरा क़ुसूर क्या है
हाँ दरवाज़े पर चढ़ी कुंडी उतार ली गई हैमगर दरवाज़ों को खोलने के लिएख़ुद ही चल कर जाना होगाआँखों की पट्टी खोल दिए जाने पर भीबीनाई को निगाह की आदत धीरे धीरे ही पड़ती हैहोंटों पर लगी मोहरें हट जाने पर भीबोलने के लिए ज़बान को अल्फ़ाज़ की मश्क़ करानी होती हैआज़ाद तो दिमाग़ को होना हैसिर्फ़ जिस्म की आज़ादी कोई मा'नी नहीं रखतीसर की चादर से अपनी बरहनगी अपने हाथों ढकनी होगीसर पर ताज है और पैरों में बेड़ियाँक्या अजीब नहीं लगताज़िना से ले कर आधी गवाही तकबे-शक ये चार्ज-शीट बहुत लम्बी हैलेकिन मुझे इस के बारे में सोचने कीन फ़ुर्सत है न ज़रूरतवैसे भी ये चार्ज-शीट मेरी अदम-मौजूदगी में तय्यार की गई थीदुश्नाम मिले या इनआ'म मुझे इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़तामुझे तो अपने आज़ाद हाथों से अपने पैरों की बेड़ियाँ हटा करइस मल्गजे अँधेरे को अपनी पलकों से बटोर करकिनारे लगाना हैदरवाज़े तक जाना हैकि इन बंद पट्टों से बाहर एक खुली फ़ज़ामेरा इंतिज़ार कर रही हैजहाँ मैं कम-अज़-कम आज़ादी से साँस तो ले सकूँगीहाँ मैं शहर में दाख़िल होने वाली पहली औरत हूँकहीं भी पहुँचने के लिए उठाया हुआपहला क़दम
फिर जुट जाता है वो नादानबटोर कर उन्हेंफिर से सजाने में
काएनात जिस की बागेंकिसी हादसे के हाथ में दे करख़ुदा-वंद-ए-करीम इबादतें बटोर रहा हैक्या उसे सिर्फ़ यही ग़रज़ हैकि वो पहचाना जाए याउस के होने कीकुछ और भी हक़ीक़त हैइस मुल्क में जहाँ ब-ज़ाहिर आज़ादी हैग़ुलामी के तौक़ पहने हुए एड़ियाँ रगड़ती दिल मसोसती जाँ-ब-लब ज़िंदगीउम्र का तवील सफ़र तय करने कहाँ जाएगीक्या कोई और ज़िंदगी-बख़्श सय्यारा दरयाफ़्त हो चुका हैक्या कोई और ज़मीन ढूँड ली गई हैइतनी बड़ी दुनिया में क्या छोटे-पन को दफ़्न करने की कोई जगह बाक़ी नहींक्या समुंदरों ने इक़रार कर लिया है कि वो मुर्दार निगलेंगेऔर कश्तियों को बंदरगाहों के किनारों पर पहुँचा कर क़ज़्ज़ाक़ों के हवाले कर देंगेआँख जब पत्थर बरसाने लगेगी तो आँसू-भर ख़जालतमाथे से नुमूदार हो कर अपने होने का एहसास दिलाएँ गेइस आज़ाद मुल्क में जहाँ ग़ुलामी के तौक़ पहनेएड़ियाँ रगड़ती दिल मसोसती जाँ-ब-लब ज़िंदगी इंतिज़ार में हैकि इबादतें बटोरता ख़ुदा काएनात की सीढ़ियों तक तो आए
मेरे कमरे मेंएक आईनाघड़ी के साथ टंगा थाहवा के एक झोंके सेकल गिर कर टूट गयाटुकड़े-टुकड़े बिखर गयाटूटे टुकड़े बटोर रहा थाजाने कैसे उंगली सेख़ून का एक क़तरा निकल आयाऔरउन बिखरे हुए टुकड़ों मेंख़ून के सैकड़ों क़तरे चमक उठेपहले तो ये बात न थी
लफ़्ज़ बहुत थोड़े होते हैंलेकिन उन को जोड़ बटोर केइक ऐसी छोटी सी अराज़ी तो ख़रीदी जा सकती हैजिस में सुनहरी ख़्वाब ही काश्त किए जाएँलफ़्ज़ बहुत महँगे होते हैंलेकिन उन को काट-कूट कर क़िस्तों पर इक बाजा तो आ सकता है
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनोंन मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी कीन तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत-अंदाज़ नज़रों सेन मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों सेन ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज़ नज़रों से
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगीलोग बे-वज्ह उदासी का सबब पूछेंगेये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँ होजगमगाते हुए लम्हों से गुरेज़ाँ क्यूँ होउँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगेकाँपते हाथों पे भी फ़िक़रे कसे जाएँगेफिर कहेंगे कि हँसी में भी ख़फ़ा होती हैंअब तो 'रूही' की नमाज़ें भी क़ज़ा होती हैंलोग ज़ालिम हैं हर इक बात का तअना देंगेबातों बातों में मिरा ज़िक्र भी ले आएँगेइन की बातों का ज़रा सा भी असर मत लेनावर्ना चेहरे के तअस्सुर से समझ जाएँगेचाहे कुछ भी हो सवालात न करना उन सेमेरे बारे में कोई बात न करना उन सेबात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
उस नार में ऐसा रूप न था जिस रूप से दिन की धूप दबेइस शहर में क्या क्या गोरी है महताब-रुख़े गुलनार-लबेकुछ बात थी उस की बातों में कुछ भेद थे उस की चितवन मेंवही भेद कि जोत जगाते हैं किसी चाहने वाले के मन मेंउसे अपना बनाने की धुन में हुआ आप ही आप से बेगानाइस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना
हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुदारातों के बा'दफिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाक़ातों के बा'दकब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहारख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बा'दथे बहुत बेदर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ केथीं बहुत बे-मेहर सुब्हें मेहरबाँ रातों के बा'ददिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दीकुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बा'दउन से जो कहने गए थे 'फ़ैज़' जाँ सदक़े किएअन-कही ही रह गई वो बात सब बातों के बा'द
वो नानी की बातों में परियों का ढेरावो चेहरे की झुरिर्यों में सदियों का फेराभुलाए नहीं भूल सकता है कोईवो छोटी सी रातें वो लम्बी कहानीवो काग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी
मैं उस की आँखों को देखता रहता हूँमगर मेरी समझ में कुछ नहीं आतामैं उस की बातों को सुनता रहता हूँमगर मेरी समझ में कुछ नहीं आताअब अगर वो कभी मुझ से मिलेतो मैं उस से बात नहीं करूँगाउस की तरफ़ देखूँगा भी नहींमैं कोशिश करूँगामेरा दिल कहीं और मुब्तला हो जाएअब मैं उसे याद बना देना चाहता हूँ
ज़िंदगी के मैले में ख़्वाहिशों के रेले मेंतुम से क्या कहें जानाँ इस क़दर झमेले मेंवक़्त की रवानी है बख़्त की गिरानी हैसख़्त बे-ज़मीनी है सख़्त ला-मकानी हैहिज्र के समुंदर मेंतख़्त और तख़्ते की एक ही कहानी हैतुम को जो सुनानी हैबात गो ज़रा सी हैबात उम्र-भर की हैउम्र-भर की बातें कब दो-घड़ी में होती हैंदर्द के समुंदर मेंअन-गिनत जज़ीरे हैं बे-शुमार मोती हैंआँख के दरीचे में तुम ने जो सजाया थाबात उस दिए की हैबात उस गिले की हैजो लहू की ख़ल्वत में चोर बन के आता हैलफ़्ज़ की फ़सीलों पर टूट टूट जाता हैज़िंदगी से लम्बी है बात रतजगे की हैरास्ते में कैसे होबात तख़लिए की हैतख़लिए की बातों में गुफ़्तुगू इज़ाफ़ी हैप्यार करने वालों को इक निगाह काफ़ी हैहो सके तो सुन जाओ एक रोज़ अकेले मेंतुम से क्या कहें जानाँ इस क़दर झमेले हैं
क़ल्ब ओ नज़र की ज़िंदगी दश्त में सुब्ह का समाँचश्मा-ए-आफ़्ताब से नूर की नद्दियाँ रवाँ!हुस्न-ए-अज़ल की है नुमूद चाक है पर्दा-ए-वजूददिल के लिए हज़ार सूद एक निगाह का ज़ियाँ!सुर्ख़ ओ कबूद बदलियाँ छोड़ गया सहाब-ए-शब!कोह-ए-इज़म को दे गया रंग-ब-रंग तैलिसाँ!गर्द से पाक है हवा बर्ग-ए-नख़ील धुल गएरेग-ए-नवाह-ए-काज़िमा नर्म है मिस्ल-ए-पर्नियाँआग बुझी हुई इधर, टूटी हुई तनाब उधरक्या ख़बर इस मक़ाम से गुज़रे हैं कितने कारवाँआई सदा-ए-जिब्रईल तेरा मक़ाम है यहीएहल-ए-फ़िराक़ के लिए ऐश-ए-दवाम है यहीकिस से कहूँ कि ज़हर है मेरे लिए मय-ए-हयातकोहना है बज़्म-ए-कायनात ताज़ा हैं मेरे वारदात!क्या नहीं और ग़ज़नवी कारगह-ए-हयात मेंबैठे हैं कब से मुंतज़िर अहल-ए-हरम के सोमनात!ज़िक्र-ए-अरब के सोज़ में, फ़िक्र-ए-अजम के साज़ मेंने अरबी मुशाहिदात, ने अजमी तख़य्युलातक़ाफ़िला-ए-हिजाज़ में एक हुसैन भी नहींगरचे है ताब-दार अभी गेसू-ए-दजला-ओ-फ़ुरात!अक़्ल ओ दिल ओ निगाह का मुर्शिद-ए-अव्वलीं है इश्क़इश्क़ न हो तो शर-ओ-दीं बुतकद-ए-तसव्वुरात!सिदक़-ए-ख़लील भी है इश्क़ सब्र-ए-हुसैन भी है इश्क़!म'अरका-ए-वजूद में बद्र ओ हुनैन भी है इश्क़!अाया-ए-कायनात का म'अनी-ए-देर-याब तू!निकले तिरी तलाश में क़ाफ़िला-हा-ए-रंग-ओ-बू!जलवतियान-ए-मदरसा कोर-निगाह ओ मुर्दा-ज़ाैक़जलवतियान-ए-मयकदा कम-तलब ओ तही-कदू!मैं कि मिरी ग़ज़ल में है आतिश-ए-रफ़्ता का सुराग़मेरी तमाम सरगुज़िश्त खोए हुओं की जुस्तुजू!बाद-ए-सबा की मौज से नश-नुमा-ए-ख़ार-अो-ख़स!मेरे नफ़स की मौज से नश-ओ-नुमा-ए-आरज़ू!ख़ून-ए-दिल ओ जिगर से है मेरी नवा की परवरिशहै रग-ए-साज़ में रवाँ साहिब-ए-साज़ का लहू!फुर्सत-ए-कशमुकश में ईं दिल बे-क़रार रायक दो शिकन ज़्यादा कुन गेसू-ए-ताबदार रालौह भी तू, क़लम भी तू, तेरा वजूद अल-किताब!गुम्बद-ए-आबगीना-रंग तेरे मुहीत में हबाब!आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक में तेरे ज़ुहूर से फ़रोग़ज़र्रा-ए-रेग को दिया तू ने तुलू-ए-आफ़्ताब!शौकत-ए-संजर-ओ-सलीम तेरे जलाल की नुमूद!फ़क़्र-ए-'जुनेद'-ओ-'बायज़ीद' तेरा जमाल बे-नक़ाब!शौक़ तिरा अगर न हो मेरी नमाज़ का इमाममेरा क़याम भी हिजाब! मेरा सुजूद भी हिजाब!तेरी निगाह-ए-नाज़ से दोनों मुराद पा गएअक़्ल, ग़याब ओ जुस्तुजू! इश्क़, हुज़ूर ओ इज़्तिराब!तीरा-ओ-तार है जहाँ गर्दिश-ए-आफ़ताब से!तब-ए-ज़माना ताज़ा कर जल्वा-ए-बे-हिजाब से!तेरी नज़र में हैं तमाम मेरे गुज़िश्ता रोज़ ओ शबमुझ को ख़बर न थी कि है इल्म-ए-नख़ील बे-रुतब!ताज़ा मिरे ज़मीर में म'अर्क-ए-कुहन हुआ!इश्क़ तमाम मुस्तफ़ा! अक़्ल तमाम बू-लहब!गाह ब-हीला मी-बरद, गाह ब-ज़ोर मी-कशदइश्क़ की इब्तिदा अजब इश्क़ की इंतिहा अजब!आलम-ए-सोज़-ओ-साज़ में वस्ल से बढ़ के है फ़िराक़वस्ल में मर्ग-ए-आरज़ू! हिज्र में ल़ज़्जत-ए-तलब!एेन-ए-विसाल में मुझे हौसला-ए-नज़र न थागरचे बहाना-जू रही मेरी निगाह-ए-बे-अदब!गर्मी-ए-आरज़ू फ़िराक़! शोरिश-ए-हाव-ओ-हू फ़िराक़!मौज की जुस्तुजू फ़िराक़! क़तरे की आबरू फ़िराक़!
साक़ी की हर निगाह पे बल खा के पी गयालहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गयाबे-कैफ़ियों के कैफ़ से घबरा के पी गयातौबा को तोड़-ताड़ के थर्रा के पी गयाज़ाहिद! ये तेरी शोख़ी-ए-रिन्दाना देखनारहमत को बातों बातों में बहला के पी गयासर-मस्ती-ए-अज़ल मुझे जब याद आ गईदुनिया-ए-ए'तिबार को ठुकरा के पी गयाआज़ुर्दगी-ए-ख़ातिर-ए-साक़ी को देख करमुझ को ये शर्म आई कि शर्मा के पी गयाऐ रहमत-ए-तमाम मिरी हर ख़ता मुआफ़मैं इंतिहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गयापीता बग़ैर इज़्न ये कब थी मिरी मजालदर-पर्दा चश्म-ए-यार की शह पा के पी गयाउस जान-ए-मय-कदा की क़सम बारहा 'जिगर'कुल आलम-ए-बसीत पे मैं छा के पी गया
सब माल निकालो, ले आओऐ बस्ती वालो ले आओये तन का झूटा जादू भीये मन की झूटी ख़ुश्बू भीये ताल बनाते आँसू भीये जाल बिछाते गेसू भीये लर्ज़िश डोलते सीने कीपर सच नहीं बोलते सीने कीये होंट भी, हम से क्या चोरीक्या सच-मुच झूटे हैं गोरी?इन रम्ज़ों में इन घातों मेंइन वादों में इन बातों मेंकुछ खोट हक़ीक़त का तो नहीं?कुछ मैल सदाक़त का तो नहीं?ये सारे धोके ले आओये प्यारे धोके ले आओक्यूँ रक्खो ख़ुद से दूर हमेंजो दाम कहो मंज़ूर हमें
मुझे मत बतानाकि तुम ने मुझे छोड़ने का इरादा किया थातो क्यूँऔर किस वज्ह सेअभी तो तुम्हारे बिछड़ने का दुख भी नहीं कम हुआअभी तो मैंबातों के वादों के शहर-ए-तिलिस्मात मेंआँख पर ख़ुश-गुमानी की पट्टी लिएतुम को पेड़ों के पीछे दरख़्तों के झुण्डऔर दीवार की पुश्त पर ढूँडने में मगन हूँकहीं पर तुम्हारी सदा और कहीं पर तुम्हारी महकमुझ पे हँसने में मसरूफ़ हैअभी तक तुम्हारी हँसी से नबर्द-आज़मा हूँऔर इस जंग मेंमेरा हथियारअपनी वफ़ा पर भरोसा है और कुछ नहींउसे कुंद करने की कोशिश न करनामुझे मत बताना.....
इक मौलवी साहब की सुनाता हूँ कहानीतेज़ी नहीं मंज़ूर तबीअत की दिखानीशोहरा था बहुत आप की सूफ़ी-मनुशी काकरते थे अदब उन का अआली ओ अदानीकहते थे कि पिन्हाँ है तसव्वुफ़ में शरीअतजिस तरह कि अल्फ़ाज़ में मुज़्मर हों मआनीलबरेज़ मय-ए-ज़ोहद से थी दिल की सुराहीथी तह में कहीं दुर्द-ए-ख़याल-ए-हमा-दानीकरते थे बयाँ आप करामात का अपनीमंज़ूर थी तादाद मुरीदों की बढ़ानीमुद्दत से रहा करते थे हम-साए में मेरेथी रिंद से ज़ाहिद की मुलाक़ात पुरानीहज़रत ने मिरे एक शनासा से ये पूछा'इक़बाल' कि है क़ुमरी-ए-शमशाद-ए-मआनीपाबंदी-ए-अहकाम-ए-शरीअत में है कैसागो शेर में है रश्क-ए-कलीम-ए-हमदानीसुनता हूँ कि काफ़िर नहीं हिन्दू को समझताहै ऐसा अक़ीदा असर-ए-फ़लसफ़ा-दानीहै उस की तबीअत में तशय्यो भी ज़रा सातफ़्ज़ील-ए-अली हम ने सुनी उस की ज़बानीसमझा है कि है राग इबादात में दाख़िलमक़्सूद है मज़हब की मगर ख़ाक उड़ानीकुछ आर उसे हुस्न-फ़रामोशों से नहीं हैआदत ये हमारे शोरा की है पुरानीगाना जो है शब को तो सहर को है तिलावतइस रम्ज़ के अब तक न खुले हम पे मआनीलेकिन ये सुना अपने मुरीदों से है मैं नेबे-दाग़ है मानिंद-ए-सहर उस की जवानीमज्मुआ-ए-अज़्दाद है 'इक़बाल' नहीं हैदिल दफ़्तर-ए-हिकमत है तबीअत ख़फ़क़ानीरिंदी से भी आगाह शरीअत से भी वाक़िफ़पूछो जो तसव्वुफ़ की तो मंसूर का सानीउस शख़्स की हम पर तो हक़ीक़त नहीं खुलतीहोगा ये किसी और ही इस्लाम का बानीअल-क़िस्सा बहुत तूल दिया वाज़ को अपनेता-देर रही आप की ये नग़्ज़-बयानीइस शहर में जो बात हो उड़ जाती है सब मेंमैं ने भी सुनी अपने अहिब्बा की ज़बानीइक दिन जो सर-ए-राह मिले हज़रत-ए-ज़ाहिदफिर छिड़ गई बातों में वही बात पुरानीफ़रमाया शिकायत वो मोहब्बत के सबब थीथा फ़र्ज़ मिरा राह शरीअत की दिखानीमैं ने ये कहा कोई गिला मुझ को नहीं हैये आप का हक़ था ज़े-रह-ए-क़ुर्ब-ए-मकानीख़म है सर-ए-तस्लीम मिरा आप के आगेपीरी है तवाज़ो के सबब मेरी जवानीगर आप को मालूम नहीं मेरी हक़ीक़तपैदा नहीं कुछ इस से क़ुसूर-ए-हमादानीमैं ख़ुद भी नहीं अपनी हक़ीक़त का शनासागहरा है मिरे बहर-ए-ख़यालात का पानीमुझ को भी तमन्ना है कि 'इक़बाल' को देखूँकी उस की जुदाई में बहुत अश्क-फ़िशानी'इक़बाल' भी 'इक़बाल' से आगाह नहीं हैकुछ इस में तमस्ख़ुर नहीं वल्लाह नहीं है
दुनिया के रंग अनोखे हैंजो मेरे सामने रहता है उस के घर में घर-वाली हैऔर दाएँ पहलू में इक मंज़िल का है मकाँ वो ख़ाली हैऔर बाएँ जानिब इक अय्याश है जिस के हाँ इक दाश्ता हैऔर इन सब में इक मैं भी हूँ लेकिन बस तू ही नहींहैं और तो सब आराम मुझे इक गेसुओं की ख़ुशबू ही नहींफ़ारिग़ होता हूँ नाश्ते से और अपने घर से निकलता हूँदफ़्तर की राह पर चलता हूँरस्ते में शहर की रौनक़ है इक ताँगा है दो कारें हैंबच्चे मकतब को जाते हैं और तांगों की क्या बात कहूँकारें तो छिछलती बिजली हैं तांगों के तीरों को कैसे सहूँये माना इन में शरीफ़ों के घर की धन-दौलत है माया हैकुछ शोख़ भी हैं मासूम भी हैंलेकिन रस्ते पर पैदल मुझ से बद-क़िस्मत मग़्मूम भी हैंतांगों पर बर्क़-ए-तबस्सुम हैबातों का मीठा तरन्नुम हैउकसाता है ध्यान ये रह रह कर क़ुदरत के दिल में तरह्हुम हैहर चीज़ तो है मौजूद यहाँ इक तू ही नहीं इक तू ही नहींऔर मेरी आँखों में रोने की हिम्मत ही नहीं आँसू ही नहीं
रुकी रुकी सी सफ़ें मल्गजी घटाओं कीउतार पर है सर-ए-सहन रक़्स पीपल कावो कुछ नहीं है अब इक जुम्बिश-ए-ख़फ़ी के सिवाख़ुद अपनी कैफ़ियत-ए-नील-गूँ में हर लहज़ाये शाम डूबती जाती है छुपती जाती हैहिजाब-ए-वक़्त सिरे से है बेहिस-ओ-हरकतरुकी रुकी दिल-ए-फ़ितरत की धड़कनें यक-लख़्तये रंग-ए-शाम कि गर्दिश ही आसमाँ में नहींबस एक वक़्फ़ा-ए-तारीक, लम्हा-ए-शहलासमा में जुम्बिश-ए-मुबहम सी कुछ हुई फ़ौरनतुली घटा के तले भीगे भीगे पत्तों सेहरी हरी कई चिंगारियाँ सी फूट पड़ींकि जैसे खुलती झपकती हों बे-शुमार आँखेंअजब ये आँख-मिचोली थी नूर-ओ-ज़ुल्मत कीसुहानी नर्म लवें देते अन-गिनत जुगनूघनी सियाह ख़ुनुक पत्तियों के झुरमुट सेमिसाल-ए-चादर-ए-शब-ताब जगमगाने लगेकि थरथराते हुए आँसुओं से साग़र-ए-शामछलक छलक पड़े जैसे बग़ैर सान गुमानबुतून-ए-शाम में इन ज़िंदा क़ुमक़ुमों की दमककिसी की सोई हुई याद को जगाती थीवो बे-पनाह घटा वो भरी भरी बरसातवो सीन देख के आँखें मिरी भर आती थींमिरी हयात ने देखी हैं बीस बरसातेंमिरे जनम ही के दिन मर गई थी माँ मेरीवो माँ कि शक्ल भी जिस माँ की मैं न देख सकाजो आँख भर के मुझे देख भी सकी न वो माँमैं वो पिसर हूँ जो समझा नहीं कि माँ क्या हैमुझे खिलाइयों और दाइयों ने पाला थावो मुझ से कहती थीं जब घिर के आती थी बरसातजब आसमान में हर सू घटाएँ छाती थींब-वक़्त-ए-शाम जब उड़ते थे हर तरफ़ जुगनूदिए दिखाते हैं ये भूली-भटकी रूहों कोमज़ा भी आता था मुझ को कुछ उन की बातों मेंमैं उन की बातों में रह रह के खो भी जाता थापर इस के साथ ही दिल में कसक सी होती थीकभी कभी ये कसक हूक बन के उठती थीयतीम दिल को मिरे ये ख़याल होता था!ये शाम मुझ को बना देती काश इक जुगनूतो माँ की भटकी हुई रूह को दिखाता राहकहाँ कहाँ वो बिचारी भटक रही होगीकहाँ कहाँ मिरी ख़ातिर भटक रही होगीये सोच कर मिरी हालत अजीब हो जातीपलक की ओट में जुगनू चमकने लगते थेकभी कभी तो मिरी हिचकियाँ सी बंध जातींकि माँ के पास किसी तरह मैं पहुँच जाऊँऔर उस को राह दिखाता हुआ मैं घर लाऊँदिखाऊँ अपने खिलौने दिखाऊँ अपनी किताबकहूँ कि पढ़ के सुना तो मिरी किताब मुझेफिर इस के ब'अद दिखाऊँ उसे मैं वो कापीकि टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनी थीं कुछ जिस मेंये हर्फ़ थे जिन्हें मैं ने लिक्खा था पहले-पहलऔर उस को राह दिखाता हुआ मैं घर लाऊँदिखाऊँ फिर उसे आँगन में वो गुलाब की बेलसुना है जिस को उसी ने कभी लगाया थाये जब कि बात है जब मेरी उम्र ही क्या थीनज़र से गुज़री थीं कल चार पाँच बरसातें
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