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नज़्म
सैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैं
सैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दिल के हर क़तरे में तूफ़ान-ए-तजल्ली भर दे
बत्न-ए-हर-ज़र्रा से इक महर-ए-मुबीं पैदा कर
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
कि जिन के जागते ही मौत का भी दिल दहल उठे
अभी तो बत्न-ए-ग़ैब में है इस सवाल का जवाब
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
उन के मफ़्हूम जो भी बताए गए
ख़ाक पर बसने वाले बशर को मसर्रत के जितने भी नग़्मे सुनाए गए