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नज़्म
जिन सर-अफ़राज़ों की रूहें आज हैं अफ़्लाक पर
मौत ख़ुद हैराँ थी जिन की जुरअत-ए-बे-बाक पर
तिलोकचंद महरूम
नज़्म
मुश्तइल, बे-बाक मज़दूरों का सैलाब-ए-अज़ीम!
अर्ज़-ए-मश्रिक, एक मुबहम ख़ौफ़ से लर्ज़ां हूँ मैं
नून मीम राशिद
नज़्म
वो भी हम को रो बैठे हैं चलो हुआ क़र्ज़ा बे-बाक़
खुली तो आख़िर बात असर की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
ज़ीस्त का और मौत का इदराक दुनिया को न था
ज़ुल्म का एहसास जब बे-बाक दुनिया को न था
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
शो'ला-ए-बेबाक भी है मतला-ए-अनवार भी
शम्अ की फ़ितरत में ग़ाफ़िल नूर भी है नार भी