aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "be-harf"
अब वही ख़ुफ़्ता-मिज़ाजी वही बे-हर्फ़ ख़ुमारनर्म आवाज़ों की थपकी से
बे-हर्फ़ ओ बे-हिकायत ओ बे-साज़ ओ बे-सदारग रग में नग़्मा बन के समाती चली गई
बे-हर्फ़-ओ-सौत ख़ुद-कलामी से हम-कलाम हो करमगर सूरज की किरनों की चुभन बिखेर देती है उस ख़ुद-कलामी को दिन के सहरा में
लेकिन ये सनसनाती वुसअतइतनी बे-हर्फ़ ओ बे-मुरव्वत
रंग, आवाज़, धूप, साया, हर्फ़!अक्स, इज़हार, बे-नवा, बरबत
मैं अजब आदमी हूँराएगानी के तसलसुल ने मुझे तोड़ दिया
हम कहाँ आ गएसारे बे-सम्त हैं
ख़ामुशी की आदत डाल लोसुकून मिल जाएगा
उस की मर्दांगी कोमेरे आँसुओं की हाजत थी
तुम ने इक रोज़रंग-ए-तबस्सुम से सरशार
जब हर्फ़-ए-ख़ून-ए-दाग़आँधी में एक नीम-नफ़स बे-हवा चराग़
वो हर्फ़ जो फ़ज़ा-ए-नीलगूँ की वुसअ'तों में क़ैद थावो सौत जो हिसार-ए-ख़ामुशी में जल्वा-रेज़ थी
जो बार-आवर नहीं होतावो लम्हा कैसा होता है
सुनो कि शायद ये नूर-ए-सैक़लहै उस सहीफ़े का हर्फ़-ए-अव्वल
गवाह रहनाये पस्त-क़ामत करीह चेहरों घमंड लहजों सिसकती सरगोशियों के हामिल
हुआ की पुश्त पे कितने नुक़ूश कंदा हैंकहीं नफ़स की लकीरें
हमारे आज़ा जो आसमाँ की तरफ़ दुआ के लिए उठे हैं(तुम आसमाँ की तरफ़ न देखो!)
कुछ बे-ईमानी हो जाती हैइन में लिखे हर्फ़
ऐ मिरे आगही के पयम्बरमैं तुझे कौन से हर्फ़ की नज़्र दूँ
एक शाम बे-म'अनीहर्फ़ हर्फ़ सजती है
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