aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "be-pidar"
मोहब्बत को तुम लाख फेंक आओ गहरे कुएँ मेंमगर एक आवाज़ पीछा करेगीकभी चाँदनी रात का गीत बन करकभी घुप अँधेरे की पगली हँसी बन केपीछा करेगीमगर एक आवाज़ पीछा करेगीवो आवाज़ना-ख़्वास्ता तिफ़्लक-ए-बे-पिदरएक दिनसूलियों के सहारेबनी-नौ-ए-इंसाँ की हादी बनीफिर ख़ुदा बन गईकोई माँकई साल पहलेज़माने के डर सेसर-ए-रह-गुज़रअपना लख़्त-ए-जिगर छोड़ आईवो ना-ख़्वास्ता तिफ़्लक-ए-बे-पिदरएक दिनसूलियों के सहारेबनी-नौ-ए-इंसाँ का हादी बनाफिर ख़ुदा बन गया
आज बरा-ए-फ़ातिहा शाम को जो उठाए हाथसूरतें कुछ झलक पड़ीं आँसूओं की तड़प के साथ
दवा से कुछ न हुआ और दुआ से कुछ न मिलाबशर ने कुछ न दिया और ख़ुदा से कुछ न मिला
सुनिए इक ना-आक़िबत-अँदेश की फ़रियाद हैकह रहा है वो मुझे अपनी जवानी याद हैमैं जिसे कहता था घर वो आज तिफ़्ल-आबाद हैमेरी तन्हा जान है और कसरत-ए-औलाद है''ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''
दर्द है दिल के लिए और दिल इंसाँ के लिएताज़गी बर्ग-ओ-समर की चमनिस्ताँ के लिए
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
ढूँढती फिरती रही रूह किसी साथी कोदर-ब-दर ठोकरें खाता रहा पिंदार मिराअपनी मिट्टी से भी उट्ठी नहीं सोंधी ख़ुशबूग़ैर के देस में लुटता रहा संसार मिरा
माज़ी के महल की कोहना दीवारटूटा नहीं बे-हिसी का पिंदार
अब के सोचा है कि ये बात बता दूँ उस को
दिल में उठती है मसर्रत की लहर होली मेंमस्तियाँ झूमती हैं शाम-ओ-सहर होली में
मोहब्बत ज़िंदगी हैमोहब्बत दिल की तीरा साअ'तों में रौशनी हैये वीरानों में ख़ुद-रौ नग़्मगी हैमोहब्बत जुरअत-ए-इज़हार है किरदार हैमोहब्बत दीदा-ए-बेदार है पिंदार हैईसार हैमोहब्बत जान देती हैमोहब्बत मान देती हैमोहब्बत बे-निशाँ रिश्तों को भी पहचान देती हैमोहब्बत अक़्ल भी हैमोहब्बत मावरा-ए-अक़्ल भी हैमोहब्बत हिज्र भी है वस्ल भी हैमोहब्बत पेश-रफ़्त-ए-नस्ल भी हैमोहब्बत ज़ख़्म पर मरहममोहब्बत सर-बसर तरह्हुममोहब्बत मोहतरम सच का इल्म ज़ोर-ए-क़लममोहब्बत काविश-ए-पैहममोहब्बत राज़ यज़्दाँ खोलती हैमोहब्बत ज़र्फ़-ए-आदम तोलती हैमोहब्बत ख़ामुशी में बोलती हैमोहब्बत आरज़ू है जुस्तुजू है रंग-ओ-बू हैमोहब्बत जीत कर मिटने की ख़ू हैमोहब्बत हार कर भी सुर्ख़-रू हैमोहब्बत इब्तिदा है इंतिहा हैमोहब्बत बाइ'स-ए-अर्ज़-ओ-समा हैमोहब्बत में ख़ुदा भी मुब्तला है
क़ौम ने पैग़ाम-ए-गौतम की ज़रा परवा न कीक़द्र पहचानी न अपने गौहर-ए-यक-दाना कीआह बद-क़िस्मत रहे आवाज़-ए-हक़ से बे-ख़बरग़ाफ़िल अपने फल की शीरीनी से होता है शजरआश्कार उस ने किया जो ज़िंदगी का राज़ थाहिन्द को लेकिन ख़याली फ़ल्सफ़ा पर नाज़ थाशम-ए-हक़ से जो मुनव्वर हो ये वो महफ़िल न थीबारिश-ए-रहमत हुई लेकिन ज़मीं क़ाबिल न थीआह शूदर के लिए हिन्दोस्ताँ ग़म-ख़ाना हैदर्द-ए-इंसानी से इस बस्ती का दिल बेगाना हैबरहमन सरशार है अब तक मय-ए-पिंदार मेंशम-ए-गौतम जल रही है महफ़िल-ए-अग़्यार मेंबुत-कदा फिर बाद मुद्दत के मगर रौशन हुआनूर-ए-इब्राहीम से आज़र का घर रौशन हुआफिर उठी आख़िर सदा तौहीद की पंजाब सेहिन्द को इक मर्द-ए-कामिल ने जगाया ख़्वाब से
किसी की तबीअत में पिंदार-ए-मस्तीकिसी को ग़ुरूर-ए-जवानी की मस्तीकोई मस्त मय-ख़ाना-ए-ख़ुद-परस्तीअमीरों की दुनिया तकब्बुर की पस्तीफ़रेबों के साए में डेरा है उन कागुनाहों के घर में बसेरा है उन काकोई अपने ज़ोर-ए-हुकूमत पे नाज़ाँकोई माल-ओ-दौलत की कसरत पे नाज़ाँकोई अपने ऐवाँ की रिफ़अत पे नाज़ाँकोई हशमत-ओ-जाह-ओ-सरवत पे नाज़ाँवो नशा चढ़ा है कि भूला ख़ुदा भीये सुनते नहीं बेकसों की दुआ भीजो नायाब शय हो उसे ढूँड लाएँजो मर्ग़ूब-ए-ख़ातिर हो वो चीज़ खाएँजो गर्मी को चाहें तो सर्दी बनाएँउड़ाईं पहाड़ों की ठंडी हवाएँज़माने में चलती अगर है तो उन कीयहाँ दाल गलती अगर है तो उन कीहै दुश्वार उन को बुलंदी न पस्तीअमीरों की दुनिया में महँगी भी सस्तीन देखी उन्हों ने कभी फ़ाक़ा मस्तीये हैं बेनियाज़-ए-ग़म-ए-तंग-दस्तीये मुफ़्लिस की मुश्किल को क्या जानते हैंये नादार को ख़ाक पहचानते हैंगुज़रती है शब जो हवस-रानियों मेंतो कटता है दिन फ़ित्ना-सामानियों मेंये हैं मस्त अपनी तन-आसानियों मेंज़माना है इन से परेशानियों मेंग़रीबों के हक़ में बला बनने वालेयतीमों के हक़ में क़ज़ा बनने वालेज़माना हो ज़च जिस से वो चाल कर देंजो मुमकिन हो दुनिया का पामाल कर देंअगर हो सके सब को कंगाल कर देंजो ख़ुश-हाल हों उन को बद-हाल कर देंग़रज़ उन के दिल हैं मोहब्बत से ख़ालीउख़ुव्वत से ख़ाली इनायत से ख़ालीजो बोले कोई तो ज़बान काट डालेंजो देखे कोई उस की आँखें निकालेंनहीं उन से मुमकिन किसी को सँभालेंकोई मर रहा हो तो उस को बचा लेंमगर शुक्र है 'अर्श' फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा कावो ख़ल्लाक़ हाफ़िज़ है हर बे-नवा का
तुम्हारे अज़्म-ए-जवाँ ने अक्सरनए ख़यालों का नूर बख़्शा था आगही कोकोई भी तारीख़ पा-ब-जौलाँ न कर सकी थीतुम्हारी आज़ाद-ओ-आसमाँ-गीर ज़िंदगी कोशिकस्त हरगिज़ न दे सकी थीतुम्हारे जज़्बों तुम्हारे पिंदार-ए-बंदगी को
सखी फिर आ गई रुत झूलने की गुनगुनाने कीसियह आँखों की तह में बिजलियों के डूब जाने कीसुबुक हाथों से मेहंदी की हरी शाख़ें झुकाने कीलगन में रंग आँचल में धनक के मुस्कुराने कीउमंगों के सुबू से क़तरा क़तरा मय टपकने कीघनेरे गेसुओं में अध-खिली कलियाँ सजाने की
क़ौम ने पैग़ाम-ए-गौतम की ज़रा परवा न कीक़द्र पहचानी न अपने गौहर-ए-यक-दाना कीआह बद-क़िस्मत रहे आवाज़-ए-हक़ से बे-ख़बरग़ाफ़िल अपने फल की शीरीनी से होता है शजरआश्कार उस ने किया जो ज़िंदगी का राज़ थाहिन्द को लेकिन ख़याली फ़लसफ़े पर नाज़ थाशम-ए-हक़ से जो मुनव्वर हो ये वो महफ़िल न थीबारिश-ए-रहमत हुई लेकिन ज़मीं क़ाबिल न थीआह शूदर के लिए हिन्दोस्ताँ ग़म-ख़ाना हैदर्द-ए-इंसानी से इस बस्ती का दिल बेगाना हैबरहमन सरशार है अब तक मय-ए-पिंदार मेंशम-ए-गौतम जल रही है महफ़िल-ए-अग़्यार मेंबुत-कदा फिर बा'द-ए-मुद्दत के मगर रौशन हुआनूर-ए-इब्राहीम से आज़र का घर रौशन हुआफिर उठी आख़िर सदा तौहीद की पंजाब सेहिन्द को इक मर्द-ए-कामिल ने जगाया ख़्वाब से
आज की रात बहुत सर्द बहुत काली हैतीरगी ऐसे लिपटती है हवा-ए-ग़म सेअपने बिछड़े हुए साजन से मिली है जैसेमिशअल-ए-ख़्वाब कुछ इस तौर बुझी है जैसेदर्द ने जागती आँखों की चमक खा ली हैशौक़ का नाम न ख़्वाहिश का निशाँ है कोईबर्फ़ की सिल ने मिरे दिल की जगह पा ली हैअब धुँदलके भी नहीं ज़ीनत-ए-चश्म-ए-बे-ख़्वाबआस का रूप-महल दस्त-ए-तही है जैसेबहर-ए-इम्कान पे काई सी जमी है जैसेऐसे लगता है कि जैसे मिरा मामूरा-ए-जाँकिसी सैलाब-ज़दा घर की ज़बूँ-हाली हैन कोई दोस्त न तारा कि जिसे बतलाऊँइस तरह टूट के बिखरा है अना का शीशामेरा पिंदार मिरे दिल के लिए गाली हैनब्ज़ तारों की तरह डूब रही है जैसे!ग़म की पिन्हाई समुंदर से बड़ी है जैसे!आँख सहराओं के दामन की तरह ख़ाली हैवहशत-ए-जाँ की तरफ़ देख के यूँ लगता हैमौत इस तरह के जीने से भली है जैसेतीरगी छटने लगी, वक़्त रुकेगा क्यूँ-करसुब्ह-ए-ख़ुर्शीद लिए दर पे खड़ी है जैसेदाग़-ए-रुस्वाई छुपाने से नहीं छुप सकताये तो यूँ है कि जबीं बोल रही है जैसे!
इक निदा आई बहुत दूर से कानों में मिरेफिर ख़याल आया कि ये वहम मिरा हो शायदमेरे उलझे हुए ख़्वाबों के सनम ख़ाने हैंमेरे अन्फ़ास की मौहूम सदा हो शायदमैं तसव्वुर के ख़लाओं में भटकता हूँ सदाशबनमी सोच की रास आती नहीं मुझ को हवाजो मिरे शौक़-ए-तकल्लुम की तलबगार न होइस से क़ुर्बत की तमन्ना का तक़ाज़ा बे-सूदख़्वाब जो आँखों में मजहूल नज़ारा हो जाएउस के सच होने का बे-मा'नी दिलासा बे-सूदबे-निदा ख़्वाहिश लैला से मुझे क्या हासिलऐसी नादीदा ज़ुलेख़ा से मुझे क्या हासिलक्या ख़बर इस के तख़य्युल में मिरा नाम न होमुझ से मिलने की हिमाक़त से वो कतरा जाएक्या पता मेरी रिफ़ाक़त उसे मंज़ूर न होमुझ से मिल बैठे मगर जल्द ही उक्ता जाएवस्ल मामूरा-ए-एहसास के ख़्वाबों में रहेहसरत शरफ़ मुलाक़ात सराबों में रहेक्या पता उस को मिरे क़ुर्ब की ख़्वाहिश ही न होबात करनी भी न हो उस को गवारा मुझ सेक्या ख़बर पहली मुलाक़ात पे वो ये कह देरखना उम्मीद न मिलने की दोबारा मुझ सेये तसव्वुर मिरे पिंदार से टकराते हैंमेरे जज़्बात इसी ख़ौफ़ से मर जाते हैंजो सदा दूर से आई है फ़क़त वहम से वोवहम के साए से उम्मीद लगाना है फ़ुज़ूलदहर की तल्ख़ हक़ीक़त को नज़र में रख कररेत पर ख़्वाबों की तस्वीर बनाना है फ़ुज़ूलऐसी तस्वीर का हर रंग उतर जाता हैवक़्त के साथ ख़लाओं में बिखर जाता है
हम तो शाइ'र हैं हम सच नहीं बोलतेजान-ए-जाँ सच पे क्यों इतना इसरार हैसच की अज़्मत से कब हम को इंकार हैहम भी शाइ'र हैं आख़िर उसी क़ौम केजिस का हर फ़र्द बिकने पे तय्यार हैहम हैं लफ़्ज़ों के ताजिर ये बाज़ार हैसच तो ये है गुज़रते हुए वक़्त सेफ़ाएदा जो उठा ले वो फ़नकार हैहम न सुक़रात हैं हम न मंसूर हैंहम से सच की तवक़्क़ो ही बे-कार हैतेज़ तलवार सी वक़्त की धार हैइस लिए जान-ए-जाँ अपनी तहरीर सेख़ौफ़-ए-ता'ज़ीर सेसच्चे मोती कभी हम नहीं रोलतेहम तो शाइ'र हैं हम सच नहीं बोलते
उन को मुझ से गिला मुझ को उन से गिला वो भी ख़ामोश हैं मैं भी ख़ामोश हूँख़ामुशी बन गई हासिल-ए-मुद्दआ वो भी ख़ामोश हैं मैं भी ख़ामोश हूँकश्मकश में हैं मग़रूर रानाइयाँ बे-अमाँ फिरती हैं कितनी परछाइयाँबीते लम्हों का आईना धुँदला गया वो भी ख़ामोश हैं मैं भी ख़ामोश हूँकोई अफ़्साना कहती नहीं ज़िंदगी धड़कनें दिल की हैं अजनबी अजनबीबरबत-ए-आरज़ू हो गया बे-सदा वो भी ख़ामोश हैं मैं भी ख़ामोश हूँसर्द है आतिशीं वलवलों की जबीं दिल धड़कते हैं और आँख उठती नहींकौन बतलाए किस से हुई है ख़ता वो भी ख़ामोश हैं मैं भी ख़ामोश हूँहोश किस को कि दोहराए रूदाद-ए-ग़म रूठी रूठी सी है लज़्ज़त-ए-कैफ़-ओ-कमखोया खोया सा है ए'तिमाद-ए-वफ़ा वो भी ख़ामोश हैं मैं भी ख़ामोश हूँतल्ख़ी-ए-शौक़ के दाग़ धुलते नहीं जी मचलता है और होंट खुलते नहींकितनी बेबस है एहसास की हर अदा वो भी ख़ामोश हैं मैं भी ख़ामोश हूँकैसे ये पेच-ओ-ख़म आ पड़े ना-गहाँ हम-सफ़र हम-सफ़र से हुआ बद-गुमाँगुम अँधेरों में होने लगा रास्ता वो भी ख़ामोश हैं मैं भी ख़ामोश हूँवजह-ए-आज़ुर्दगी ता-ब-लब आए क्या एक पिंदार है कितना सब्र-आज़माप्यार को मिल गया इक नया मश्ग़ला वो भी ख़ामोश हैं मैं भी ख़ामोश हूँहुरमत इक दर्द की ख़म-ब-ख़म रहगुज़र कर रही है इशारे कि आओ इधरकौन मंज़िल का किस को बताए पता वो भी ख़ामोश हैं मैं भी ख़ामोश हूँ
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