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नज़्म
अर्श सिद्दीक़ी
नज़्म
आरज़ूमंद आँखें बशारत-तलब दिल दुआओं को उट्ठे हुए हाथ सब बे-समर रह गए
और हवा चुप रही
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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आरज़ूमंद आँखें बशारत-तलब दिल दुआओं को उट्ठे हुए हाथ सब बे-समर रह गए
और हवा चुप रही