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नज़्म
बिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम हो
बेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा
चाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
उस शाम मुझे मालूम हुआ खेतों की तरह इस दुनिया में
सहमी हुई दो-शीज़ाओं की मुस्कान भी बेची जाती है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जौन एलिया
नज़्म
कभी कोई सिफ़्ला है आक़ा कभी कोई अब्ला फ़र्ज़ीं
बेची लाज भी अपने हुनर की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
अपनी ग़ैरत बेच डालीं अपना मस्लक छोड़ दें
रहनुमाओं में भी कुछ लोगों का ये मंशा तो है