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नज़्म
क़िस्मत का सितम ही कम नहीं कुछ ये ताज़ा सितम ईजाद न कर
यूँ ज़ुल्म न कर बे-दाद न कर
अख़्तर शीरानी
नज़्म
कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बा'द
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
हम ने तो दोनों को देखा दोनों ही बे-दर्द कठोर
धरती वाला अंबर वाला पहला चाँद और दूजा चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ज़माना मुश्किलों के जाल फैलाए तो फैलाए
क़दम बढ़ते रहें बे-दर्द दुनिया लाख बहकाए
राजेन्द्र नाथ रहबर
नज़्म
किसी के पंजा-ए-बे-दर्द ही से टूट जाने दो
फिर इस के ब'अद तो बस इक सुकूत-ए-मुस्तक़िल होगा
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
पत्थरों की इसी अंजुमन का मुग़न्नी हूँ मैं
और बेदर्द बे-हिस सितमगार पत्थर सुनेंगे कभी
वहीद अख़्तर
नज़्म
वहीद अख़्तर
नज़्म
औज-ए-अफ़्लाक पे है माँग की अफ़्शाँ की दमक
शीशा-ए-मह से छलक कर मय-ए-तुंद-ओ-बे-दर्द