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नज़्म
कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बा'द
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
हम ने तो दोनों को देखा दोनों ही बे-दर्द कठोर
धरती वाला अंबर वाला पहला चाँद और दूजा चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ज़माना मुश्किलों के जाल फैलाए तो फैलाए
क़दम बढ़ते रहें बे-दर्द दुनिया लाख बहकाए
राजेन्द्र नाथ रहबर
नज़्म
कहाँ तक साँस की डोरी से रिश्ते झूट के बाँधें
किसी के पंजा-ए-बे-दर्द ही से टूट जाने दो