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नज़्म
काटी है उम्र अब्रू-ए-तेग़-ए-दो-दम के साथ
मैं उस के दम के साथ हूँ वो मेरे दम के साथ
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
जिस किसी ने इन दिनों कोई दवा ईजाद की
बस ये समझो उस ने इक बस्ती नई आबाद की
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
वो कहते हैं कल मरता हो तो आज ही मर जाए
मरने से मगर पहले इधर टैक्स वो धर जाए
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
मैं ने इक बज़्म-ए-सुख़न में कल ग़ज़ल अपनी पढ़ी
जिस को सुन कर अहल-ए-महफ़िल झूम उठ्ठे वज्द से
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
किस बला की तीरगी ऐ चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम है
कुछ पता चलता नहीं ये सुब्ह है या शाम है
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
जब रखते हो तुम अबरू-ए-ख़मदार वग़ैरा
क्यों बाँधे पड़े फिरते हो तलवार वग़ैरा
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
एक दिन मैं ने कहा ये एक जूते चोर से
जूतियों पर क्यों हमेशा तेरी रहती है नज़र
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़
तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम हो
बेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
निशान-ए-बर्ग-ए-गुल तक भी न छोड़ उस बाग़ में गुलचीं
तिरी क़िस्मत से रज़्म-आराइयाँ हैं बाग़बानों में