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नज़्म
वो सब इक बर्फ़ानी भाप की चमकीली और चक्कर खाती गोलाई थे
सो मेरे ख़्वाबों की रातें जलती और दहकती रातें
जौन एलिया
नज़्म
अभी साँप-छतरी लगाए हुए भाप नीले ख़लाओं की जानिब रवाँ है
वो जिस की ज़ियाफ़त की तय्यारियाँ थीं कहाँ है
अमीक़ हनफ़ी
नज़्म
ज़िक्र-ए-मौला से लबों पर अब वो नर्मी ही नहीं
भाप सीने से उठे क्या दिल में गर्मी ही नहीं