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नज़्म
अम्मी अब्बू की बातों का जो जो नतीजा भोग रहा हूँ
आग़ा के अनमोल से मोती देख के सब हँसते हैं लोग
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
तुम्हें मा'लूम है ये सर्द आँखें तो हमारे मक़बरे हैं
हम इन क़ब्रों में 'उम्रें भोग देते हैं