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नज़्म
अर्ज़-ए-अलम में ख़्वार हुए हम बिगड़े रहे बरसों हालात
और कभी जब दिन निकला तो बीत गए जुग हुई न रात
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
आज बिगड़े हैं तो इक रोज़ सँवर जाएँगे
फ़ासलों मरहलों राहों की जुदाई क्या है
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
नज़्म
जश्न बपा है कुटियाओं में ऊँचे ऐवाँ काँप रहे हैं
मज़दूरों के बिगड़े तेवर देख के सुल्ताँ काँप रहे हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
यानी सुल्ह-ओ-आश्ती का दें हम आपस में पयाम
मुश्किलें आसान हों बिगड़े हुए बन जाएँ काम
सफ़ीर काकोरवी
नज़्म
वो रूठे मनते जाते हैं जिन्हें मनना न आता था
वो बिगड़े बन गए आख़िर जिन्हें बनना न आता था
सय्यद मेहदी हुसैन रिज़वी
नज़्म
दीदे घुमा घुमा के कहीं क्यूँ न गोपियाँ
उन के चलन तो बिगड़े हुए इब्तिदा के हैं
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नज़्म
जाने क्या बात है बाजी को जो है मुझ से जलन
सब से कहती हैं कि इस लौंडे के बिगड़े हैं चलन