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नज़्म
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
नज़्म
जश्न बपा है कुटियाओं में ऊँचे ऐवाँ काँप रहे हैं
मज़दूरों के बिगड़े तेवर देख के सुल्ताँ काँप रहे हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
वो रूठे मनते जाते हैं जिन्हें मनना न आता था
वो बिगड़े बन गए आख़िर जिन्हें बनना न आता था