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नज़्म
जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाह-राहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकता
जहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ता-ख़िलाफ़त की बिना दुनिया में हो फिर उस्तुवार
ला कहीं से ढूँढ़ कर अस्लाफ़ का क़ल्ब-ओ-जिगर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जो है पर्दों में पिन्हाँ चश्म-ए-बीना देख लेती है
ज़माने की तबीअत का तक़ाज़ा देख लेती है