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नज़्म
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
इज़्ज़त वालों की ज़िल्लत का सब से बड़ा बाज़ार है ये
चुकते हैं ग़ैरत के सौदे बिकते हैं ईमान यहाँ
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
बिकते सर-ए-बाज़ार हैं मानिंद-ए-ज़ग़ाल आज
जो ताज़ा-नफ़स ख़्वाब-ए-तग़य्युर थे शहाबी
अज़ीज़ हामिद मदनी
नज़्म
इस महीने में ग़ारत-गरी मनअ थी, पेड़ कटते न थे तीर बिकते न थे
बे-ख़तर थी ज़मीं मुस्तक़र के लिए
अख़्तर हुसैन जाफ़री
नज़्म
जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाह-राहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में
नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में