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नज़्म
गुलाबी हो कहीं ऐसा न हो तुम ज़र्द हो जाओ
मोहब्बत की हरारत खो के बिल्कुल सर्द हो जाओ
रहमान फ़ारिस
नज़्म
कुछ बिल्कुल मिट्टी के माधो कुछ ख़ंजर की धार मिले
कुछ मंजधार में कुछ साहिल पर कुछ दरिया के पार मिले
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
दाना-पानी कर दिया जाएगा बिल्कुल तुम पे बंद
तुम को भूखों मार के क़ब्ज़े में लाया जाएगा
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
ब-ज़ाहिर गो हम इक तूदा हैं बिल्कुल राख का लेकिन
अगर चाहें तो ख़ाकिस्तर से कर दें सौ शरर पैदा
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
सच है अब हम अपनी अपनी दुनियाओं में गुम रहते हैं
ये भी सच हम दोनों बिल्कुल तन्हा जीना सीख गए हैं
अंबरीन हसीब अंबर
नज़्म
दफ़ बजते हैं सब हँसते हैं और धूम है बिल्कुल
होली की ख़ुशी में तो न कर हम से तग़ाफ़ुल