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नज़्म
आज से क़ौमी सत्ह पर हमारा यक-निकाती एजंडा क्या ठहरा
बोलिए सब बोलिए पूरे ज़ोर से बोलिए
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
बिगड़ा था फ़ैन कुछ कुछ सारा बिगाड़ डाला
पूछा तो बोले मैं तो इस को बना रहा था
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
नज़्म
सच्ची बातों से खड़े सरकार के होते हैं कान
धीरे धीरे बोलिए दीवार के होते हैं कान
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मगर जो बोली तो उस के लहजे में वो थकन थी
कि जैसे सदियों से दश्त-ए-ज़ुल्मत में चल रही हो