aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bone"
उठो सुब्ह होने लगी हैसबा बाग़ में रंग बोने लगी है
और जा-ब-जा ढेर लगाते हुएफिर से इक नई फ़स्ल बोने लगते हैं
कई लाशें मुझे अब नस्ब करनी हैंकई अरमान बोने हैं
भूल कर मक़्सद-ए-शाइरी ज़ेहन में'ऐश-ओ-'इशरत की बातों को बोने लगे
बदन धरती में बोने सेफ़क़त क़ब्रें ही उगती हैं
पतझड़ की ओट से ख़्वाब ये दिखाया हैबीज बोने वाले ने आसमाँ बनाया है
मेरी तग़ारों में बोने का मक़्सद यही थाकि मैं तुझ से दूरी पे
पीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोई
बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी मुंसिफ़ भीकिसे वकील करें किस से मुंसिफ़ी चाहें
हमारा ख़ून भी सच-मुच का सेहने पर बहा होगाहै आख़िर ज़िंदगी ख़ून अज़-बुन-ए-नाख़ुन बर-आवर-तर
दो पाँव बने हरियाली परएक तितली बैठी डाली पर
चे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबे
तब हम ने जीवन-खेती मेंकुछ ख़्वाब अनोखे बोए थे
जब कोई बात बनाए न बनेजब न कोई बात चले
ख़ून फिर ख़ून है सौ शक्ल बदल सकता हैऐसी शक्लें कि मिटाओ तो मिटाए न बने
याँ आदमी नक़ीब हो बोले है बार बारऔर आदमी ही प्यादे हैं और आदमी सवार
हर बुन-ए-मू से टपकना चाहाऔर कहीं दूर तिरे सहन में गोया
जस से रौशन-तर हुई चश्म-ए-जहाँ-बीन-ए-ख़लीलऔर वो पानी के चश्मे पर मक़ाम-ए-कारवाँ
दस करोड़ इंसानो!बोलने पे पाबंदी
नशा आता है उर्दू बोलने मेंगिलौरी की तरह हैं मुँह लगी सब इस्तेलाहें
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