aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bor"
जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँफूली नहीं बदन में समाती हैं रोटियाँआँखें परी-रुख़ों से लड़ाती हैं रोटियाँसीने उपर भी हाथ चलाती हैं रोटियाँजितने मज़े हैं सब ये दिखाती हैं रोटियाँरोटी से जिस का नाक तलक पेट है भराकरता परे है क्या वो उछल कूद जा-ब-जादीवार फाँद कर कोई कोठा उछल गयाठट्ठा हँसी शराब सनम साक़ी इस सिवासौ सौ तरह की धूम मचाती हैं रोटियाँजिस जा पे हाँडी चूल्हा तवा और तनूर हैख़ालिक़ की क़ुदरतों का उसी जा ज़ुहूर हैचूल्हे के आगे आँच जो चलती हुज़ूर हैजितने हैं नूर सब में यही ख़ास नूर हैइस नूर के सबब नज़र आती हैं रोटियाँआवे तवे तनूर का जिस जा ज़बाँ पे नामया चक्की चूल्हे के जहाँ गुलज़ार हों तमामवाँ सर झुका के कीजे ङंङवत और सलामइस वास्ते कि ख़ास ये रोटी के हैं मक़ामपहले इन्हीं मकानों में आती हैं रोटियाँइन रोटियों के नूर से सब दिल हैं बोर बोरआटा नहीं है छलनी से छन-छन गिरे है नूरपेङ़ा हर एक उस का है बर्फ़ी ओ मोती चूरहरगिज़ किसी तरह न बुझे पेट का तनूरइस आग को मगर ये बुझाती हैं रोटियाँपूछा कसी ने ये किसी कामिल फ़क़ीर सेये मेहर-ओ-माह हक़ ने बनाए हैं काहे केवो सुन के बोला बाबा ख़ुदा तुझ को ख़ैर देहम तो न चाँद समझें न सूरज हैं जानतेबाबा हमें तो ये नज़र आती हैं रोटियाँफिर पूछा उस ने कहिए ये है दिल का तूर क्याइस के मुशाहिदे में है खुलता ज़ुहूर क्यावो बोला सुन के तेरा गया है शुऊ'र क्याकश्फ़-उल-क़ुलूब और ये कश्फ़-उल-क़ुबूर क्याजितने हैं कश्फ़ सब ये दिखाती हैं रोटियाँरोटी जब आई पेट में सौ क़ंद घुल गएगुलज़ार फूले आँखों में और ऐश तुल गएदो तर निवाले पेट में जब आ के ढुल गएचौदह तबक़ के जितने थे सब भेद खुल गएये कश्फ़ ये कमाल दिखाती हैं रोटियाँरोटी न पेट में हो तो फिर कुछ जतन न होमेले की सैर ख़्वाहिश-ए-बाग़-ओ-चमन न होभूके ग़रीब दिल की ख़ुदा से लगन न होसच है कहा कसी ने कि भूके भजन न होअल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटियाँअब आगे जिस के माल-पूए भर के थाल हैंपूरे भगत उन्हें कहो साहब के लाल हैंऔर जिन के आगे रोग़नी और शीर-माल हैंआरिफ़ वही हैं और वही साहब-कमाल हैंपक्की-पकाई अब जिन्हें आती हैं रोटियाँकपड़े किसी के लाल हैं रोटी के वास्तेलम्बे किसी के बाल हैं रोटी के वास्तेबाँधे कोई रुमाल हैं रोटी के वास्तेसब कश्फ़ और कमाल हैं रोटी के वास्तेजितने हैं रूप सब ये दिखाती हैं रोटियाँरोटी से नाचे प्यादा क़वाएद दिखा दिखाअसवार नाचे घोड़े को कावा लगा लगाघुंघरू को बाँधे पैक भी फिरता है नाचताऔर इस सिवा जो ग़ौर से देखा तो जा-ब-जासौ सौ तरह के नाच दिखाती हैं रोटियाँरोटी के नाच तो हैं सभी ख़ल्क़ में पड़ेकुछ भाँड भीगते ये नहीं फिरते नाचतेये रंडियाँ जो नाचे हैं घूँघट को मुँह पे लेघूँघट न जानो दोस्तो तुम ज़ीनहार उसेइस पर्दे में ये अपने कमाती हैं रोटियाँअशराफ़ों ने जो अपनी ये ज़ातें छुपाई हैंसच पूछिए तो अपनी ये शानें बढ़ाई हैंकहिए उन्हों की रोटियाँ किस किस ने खाई हैंअशराफ़ सब में कहिए तो अब नान-बाई हैंजिन की दुकाँ से हर कहीं जाती हैं रोटियाँदुनिया में अब बदी न कहीं और निकोई हैया दुश्मनी ओ दोस्ती या तुंद-ख़ूई हैकोई किसी का और किसी का न कोई हैसब कोई है उसी का कि जिस हाथ डोई हैनौकर नफ़र ग़ुलाम बनाती हैं रोटियाँरोटी का अब अज़ल से हमारा तो है ख़मीररूखी ही रोटी हक़ में हमारे है शहद-ओ-शीरया पतली होवे मोटी ख़मीरी हो या फ़तीरगेहूँ जवार बाजरे की जैसी हो 'नज़ीर'हम को तो सब तरह की ख़ुश आती हैं रोटियाँ
लो वो चाह-ए-शब से निकला पिछले-पहर पीला महताबज़ेहन ने खोली रुकते रुकते माज़ी की पारीना किताबयादों के बे-म'अनी दफ़्तर ख़्वाबों के अफ़्सुर्दा शहाबसब के सब ख़ामोश ज़बाँ से कहते हैं ऐ ख़ाना-ख़राबगुज़री बात सदी या पल हो गुज़री बात है नक़्श-बर-आबये रूदाद है अपने सफ़र की इस आबाद ख़राबे मेंदेखो हम ने कैसे बसर की इस आबाद ख़राबे में
बीस बरस से खड़े थे जो इस गाती नहर के द्वारझूमते खेतों की सरहद पर बाँके पहरे-दारघने सुहाने छाँव छिड़कते बोर लदे छतनारबीस हज़ार में बिक गए सारे हरे भरे अश्जार
दो चूहों की एक कहानीकुछ ताज़ा है कुछ है पुरानीइक चूहे की जेब में बटवाइक चूहे के हाथ में हुक़्क़ाहुक़्क़े में थे बोर के लड्डूकुछ थे मोती-चूर के लड्डूलड्डू थे सब रंग रंगीलेकुछ थे नीली और कुछ पीलेबटवे में थे चार टमाटरऔर थोड़ा सा मिनरल वाटरलड्डू खा कर पानी पी करबोले चूहे छत पर चढ़ करकहाँ है बिल्ली उस को बुलाओआया है अब हम को तावआज नहीं वो बचने वालीबच्चा लोग बजाए तालीबिल्ली ने जब सुनी ये बातबीत चुकी थी आधी रातपहले उस ने दुम को हिलायादाँतों को दाँतों पे जमायाचुपके चुपके छत पर पहुँचीफिर तेज़ी से उन पर झपटीदोनों चूहे डर कर भागेबिल्ली पीछे चूहे आगेसॉरी सॉरी लाख वो बोलेसुनी न उन की बात किसी नेबिल्ली ने फिर मज़े उड़ाएइक इक कर के दोनों खाए
पूछ न क्या लाहौर में देखा हम ने मियाँ-'नज़ीर'पहनें सूट अंग्रेज़ी बोलें और कहलाएँ 'मीर'चौधरियों की मुट्ठी में है शाइ'र की तक़दीररोए भगत कबीरइक-दूजे को जाहिल समझें नट-खट बुद्धीवानमेट्रो में जो चाय पिलाए बस वो बाप समानसब से अच्छा शाइ'र वो है जिस का यार मुदीररोए भगत कबीरसड़कों पर भूके फिरते हैं शाइ'र मूसीक़ारएक्ट्रसों के बाप लिए फिरते हैं मोटर-कारफ़िल्म-नगर तक आ पहुँचे हैं सय्यद पीर फ़क़ीररोए भगत कबीरलाल-दीन की कोठी देखी रंग भी जिस का लालशहर में रह कर ख़ूब उड़ाए दहक़ानों का मालऔर कहे अज्दाद ने बख़्शी मुझ को ये जागीररोए भगत कबीरजिस को देखो लीडर है और से मिलो वकीलकिसी तरह भरता ही नहीं है पेट है उन का झीलमजबूरन सुनना पड़ती है उन सब की तक़दीररोए भगत कबीरमहफ़िल से जो उठ कर जाए कहलाए वो बोरअपनी मस्जिद की तारीफ़ें बाक़ी जूते-चोरअपना झंग भला है प्यारे जहाँ हमारी हीररोए भगत कबीर
जो कोई सियानी है इन में तो कोई है ना-कुनदवो शोर-बोर थी सब रंग से निपट यक चंदकोई दिलाती है साथिन को यार की सौगंदकि अब तो जामा-ओ-अंगिया के टोले हैं सब बंदफिर आ के खेलेंगे हो कर दो-चार होली में
मानें या मत मानें चच्चीबात है मेरी बिल्कुल सच्चीवही कहानी बड़ी पुरानीशुरूअ' करेंगी मुझे सुनानीदूर कहीं ख़ुश-हाल नगर मेंएक था राजा एक थी रानीजंगल में इक देव था कालाएक थी जादू-गरनी कानीले गए दोनों शहज़ादी कोछुट गया उस का दाना पानीकोई उन से जीत न पायाबड़े बड़ों की मर गई नानीइक चरवाहे के बेटे नेदिखलाई अपनी जौलानीउन दोनों को जान से मारामार के कर दी ख़त्म कहानीआप समझती हैं कि जैसेमैं भी हूँ इक बुद्धू बच्चीमानें या मत मानें चच्चीबात है मेरी बिल्कुल सच्चीकाली हो गईं मेरी रातेंसुन सुन कर ये बोर सी बातेंकोई जादू-गरनी देखीऔर न देखीं देव की घातेंचरवाहा भी मिला न कोईकहाँ हैं ऐसी ज़ातें-पातेंशाह तो बस शतरंज में है अबवो भी खा जाता है मातेंमलिका हाँ इक लंदन में हैपर वो कहाँ पिछली औक़ातेंशहज़ादी भी है तो सही परकहाँ हैं जंगल देव की बातेंचच्चा से गर पुछवा दूँ मैंहो जाएगी आप की कच्चीमानें या मत मानें चच्चीबात है मेरी बिल्कुल सच्ची
ऐ मिरी बेगम न तू मेरी ख़ुदी कमज़ोर करये शरीफ़ों का मोहल्ला है न इतना शोर करशब के पुर-तस्कीन लम्हों में न मुझ को बोर करइस सआदत-मंद शौहर को न यूँ इग्नोर करदीदा-ओ-दिल तेरी चाहत के लिए बेताब हैंमुझ से शौहर आज-कल बाज़ार में नायाब हैं
और इसी रस्ते पर मैं ने लोहे के हल्क़ों मेंइक क़ैदी को देखाआहन चेहरा सिपाही की जर्सी का रग उस क़ैदी के रुख़ पर थाहर अंदेशा तो इक कुंडी है जो दिल को अपनी जानिब खींच के रखती है और वो क़ैदी भीखिचा हुआ था अपने दिल के ख़ौफ़ की जानिब जिस की कोई रुत नहीं होतीमैं भी अपने अंदेशों का क़ैदी हूँ लेकिन उस क़ैदी के अंदेशे तोइक मेरे सिवा सब के हैंइक वही अपने अपने दुख की कुंडीजिस के खिचाव से इक इक गर्दन अपनी जानिब झुकी हुई हैऐसे में अब कौन घटाओं भरी उस सुब्ह-ए-बहाराँ को देखेगाजो इन बोर लदे अंदेशों पर यूँ झुकी हुई है आमों के बाग़ों मेंमिरी रूह के सामने
जब पढ़ाई करते करते बोर हो जाता हूँ मैंदाब कर बल्ला बग़ल में फ़ील्ड पर आता हूँ मैंफिर नहीं दुनिया-ओ-मा-फ़ीहा का कुछ रहता ख़यालखेलता जाता हूँ मैं बस खेलता जाता हूँ मैंडेड पिच हो या स्लो बॉलर तो मेरे ऐश हैंफ़ासट पिच और तेज़ बॉलर हो तो घबराता हूँ मैंइन कटर आउट कटर से हो के बिल्कुल बे-नियाज़बंद कर के आँख बस बल्ला घुमा जाता हूँ मैंजब मैं छक्का मारता हूँ और वो हो जाता है कैचअपनी इस दीवानगी पर झेंप सा जाता हूँ मैंˈफ़ॉवड् जाता हूँ मैं गुगली उठाने के लिएअक़ब में अपने मगर विकटें गिरी पाता हूँ मैंसैंचरी का गरचे ले कर दिल में जाता हूँ ख़याललेकिन अक्सर ले कर अंडा ही पलट आता हूँ मैंहो के अब मोहतात मैं खेलूँगा अगले मैच मेंहर दफ़ा ये कह के अपने दिल को समझता हूँ मैं
पाँचवाँ है और छटा है और पतंगें और डोरसातवाँ है, आठवाँ है और नवाँ करते हैं ज़ोरकोई बच्चा चीख़ता है और कोई करता है शोरक्यूँकि ये इक दूसरे को छेड़ कर करते हैं बोर''ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''
मुश्किल अंग्रेज़ी है हिन्दी बोर हैये पड़ोसी का भतीजा चोर है
याद है मुझे अब तकदिन वो तल्ख़ माज़ी काबॉस अपने घर से जबपिट-पिटा के आए थेताज़ा ताज़ा चेहरे परहर तरफ़ खरोंचे थींकट-खनी सी बिल्ली नेशायद अपने पंजों सेदोनों गाल नोचे थेनौकरी तो करना थीचाकरी भी करना थीसो जनाब-ए-वाला नेरोज़ की तरह पहलेहाल बॉस का अपनेफ़ोन पर ही पूछा थाऔर फिर रिसीवर सेफ़ोन के क्रैडल कोबेबसी से पीटा थाआँ-जनाब ने उस दिनजिस क़दर भी ग़ुस्सा थामुझ पे ही उतारा थामेरा जैसा बद-क़िस्मतजब भी सामने आयाडाँट कर भगाया था
मैं ने उस से कल ये कहातुम इंग्लिश के टीचर होइंग्लिश ख़ूब पढ़ाते होकीट्स की नज़्म सुनाते होशेक्सपियर भी पढ़ाते होतुम ने कभी ये सोचा हैदिल में उतरते लहजे मेंतुम तशरीह जो करते होकितना ध्यान मैं देती हूँकीट्स के बारे कहते होकितने दिलकश लम्हों मेंउस ने नज़्में कीं तख़्लीक़क्या ही कमाल था शाइ'रतुम जो हवाला देते होटाइटैनिक का वेलियम कालॉन्ग फ़ेलो हेनरी की औरकभी जो क़ाज़ी ईसा कीनज़्में मुझे सुनाते होइन सब का मतलब क्या हैहँस कर वो ये कहने लगाक्यों होती हो तुम बे-ज़ारक्या मेरी बातें तुम कोबोर हमेशा करती हैंकभी तो पढ़ कर देखो तुमउन की सुंदर नज़्मों कोफिर ये नज़्में क़ारी परएक जहान मआ'नी काजैसे वा कर देती हैं
शहर की आँखों का मतला साफ़ होतो दिल में उतरे ढाक के फूलों की आँचशहर के नथुने खुलें तो मौजा-ए-बाद-ए-जुनूबआम पर बोर आ चुका है ये ख़बर फैलाएशहर के कानों से निकलें शोर-ओ-ग़ुल के डाटतो छुए शह-ए-रग को कोयल की पुकारशहर की जाँ से ग़ुबार-ए-शहर का बादल छटेतो हवास-ए-ख़मसा की नगरी में भी आए बसंत
आम के दरख़्तों परबोर भी नहीं आताजामुनों के पेड़ों परकोयलें नहीं आतीं
तेरे दर्द में डूबे हुए लम्हों की कच्ची बोर उड़ती है
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुमहर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैंतुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुममैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैंतुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब मेंऔर इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनोंन मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी कीन तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत-अंदाज़ नज़रों सेन मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों सेन ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज़ नज़रों से
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
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