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नज़्म
उसे इक खोटे सिक्के की तरह सब को दिखाना है
कभी जब सोचता हूँ अपने बारे में तो कहता हूँ
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
फिरता है बोसे देता है हर इक को ख़्वाह-मख़ाह
हरगिज़ किसी के दिल को नहीं होती उस की चाह