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नज़्म
वो कैसे अपना बंजर नाम बंजर-पन में बोते हैं
मैं ''उर्र'' से आज तक इक आम शहरी हो नहीं पाया
जौन एलिया
नज़्म
हाज़िरी अब कौन बोले कौन अब आएगा लेट
कॉलेज और स्कूल हैं सुनसान ख़ाली इन के गेट
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
रेग-ए-दीरोज़ में ख़्वाबों के शजर बोते रहे
साया नापैद था साए की तमन्ना के तले सोते रहे
नून मीम राशिद
नज़्म
ब-ज़ोम-ए-ख़्वेश ज़ोह्द-ओ-इत्तिक़ा के बीज बोते हैं
ख़ुदा के फ़ज़्ल से हूरों के शौहर ऐसे होते हैं