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नज़्म
फिर मशरिक़ के साज़ों पर मग़रिब की धन हो जाती है
जब ब्वॉय-फ़्रैंडज़ पिला देते हैं फ़ौरन टुन हो जाती है
खालिद इरफ़ान
नज़्म
शाइ'र भी जो मीठी बानी बोल के मन को हरते हैं
बंजारे जो ऊँचे दामों जी के सौदे करते हैं
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
तुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गई
शिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गई
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वो माँ मैं जिस की मोहब्बत के फूल चुन न सका
वो माँ मैं जिस से मोहब्बत के बोल सुन न सका