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नज़्म
मिस्ल-ए-बू-ए-गुल है शोहरत आज उन की कू-ब-कू
शहर-ए-मेरठ को न हो क्यों नाज़ इस्मा’ईल पर
अमान ज़ख़ीरवी
नज़्म
ज़ुल्म के मौसम में बू-ए-गुल से खिलते हैं गुलाब
जुस्तुजू की मंज़िलों में ख़्वाब की मिशअल लिए
हसन नईम
नज़्म
मौसमों की ज़र्दियों से इस क़दर न ख़ौफ़ खा
बू-ए-गुल महकी हुई है कोहर के उस पार देख
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
नज़्म
ज़िंदा हस्ती की ख़बर देती है रफ़्तार-ए-नफ़स
बू-ए-गुल को ज़िंदगी का तर्जुमाँ पाता हूँ मैं
सय्यद वहीदुद्दीन सलीम
नज़्म
भीनी भीनी बू-ए-गुल रक़्स-ए-हवा कुछ भी न था
सेहन-ए-गुलशन में उदासी के सिवा कुछ भी न था
जौहर निज़ामी
नज़्म
ख़्वाबों के गुलिस्ताँ की ख़ुश-बू-ए-दिल-आरा है
या सुब्ह-ए-तमन्ना के माथे का सितारा है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं
गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया