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नज़्म
ऐ ग़ाफ़िल तुझ से भी चढ़ता इक और बड़ा ब्योपारी है
क्या शक्कर मिस्री क़ंद गरी क्या सांभर मीठा खारी है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
चढ़ती रात है ढलता सूरज खड़ी खड़ी मत पाँव मल
फिर ये जादू सो जाएगा समय जो बीता गहरी नींद
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
चिलचिलाती धूप में मैदान को चढ़ता बुख़ार
आह के मानिंद उठता हल्का हल्का सा ग़ुबार
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
जब उस को नश्शा चढ़ता है घर में ये ग़ज़ब सी आती है
जब आधी रात गुज़र जाए परवीन कलब से आती है
खालिद इरफ़ान
नज़्म
ये ऐसा दर्द है जो दिन-ब-दिन बढ़ता ही जाता है
चढ़े दरिया मोहब्बत का तो बस चढ़ता ही जाता है
सुमन ढींगरा दुग्गल
नज़्म
तड़ता मुड़ता गिरता पड़ता आगे बढ़ता रहता है
पग पग पर इस का पल पल में पानी चढ़ता रहता है