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नज़्म
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
जब उस को नश्शा चढ़ता है घर में ये ग़ज़ब सी आती है
जब आधी रात गुज़र जाए परवीन कलब से आती है
खालिद इरफ़ान
नज़्म
ये ऐसा दर्द है जो दिन-ब-दिन बढ़ता ही जाता है
चढ़े दरिया मोहब्बत का तो बस चढ़ता ही जाता है