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नज़्म
अपने सीने के मतला' पर जो चमका वो चाँद हुआ
जिस ने मन के अँधियारे में आन किया उजियारा चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
शिकस्त-ए-पैकर-ए-महसूस ने तोड़ा हिजाब आख़िर
तुलू-ए-सुब्ह-ए-महशर बन के चमका आफ़्ताब आख़िर
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
एक नया सूरज चमका है एक अनोखी ज़ौ-बारी है
ख़त्म हुई अफ़राद की शाही अब जम्हूर की सालारी है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
फिर अँधेरे में किसी हाथ में ख़ंजर चमका
शब के सन्नाटे में फिर ख़ून के दरिया चमके
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
बहुत चमका रहा हूँ ख़ाल-ओ-ख़त को सई-ए-रंगीं से
मगर पज़मुर्दगी सी ख़ाल-ओ-ख़त पर छाई जाती है