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नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
कल्ले पे कल्ला लग लग कर चलती हो मुँह में चक्की सी
हर दाँत चने से दलता हो तब देख बहारें जाड़े की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
बरसों क्या क्या चने चबाए, क्या क्या पापड़ बेले
लहरों को हमराज़ बनाया, तूफ़ानों से खेले
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
मरमरीं ख़्वाबों की परियों से लिपट कर सो जाओ
अब्र पारों पे चलो, चाँद सितारों में उड़ो
साहिर लुधियानवी
नज़्म
इक पर्दा काली मख़मल का आँखों पर छाने लगता है
इक भँवर हज़ारों शक्लों का दिल को दहलाने लगता है
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
तारे निगलती बदलियाँ चारों तरफ़ छाने लगीं
छम-छम फुवारों की झड़ी धरती पे बरसाने लगीं
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
जाता हूँ इजाज़त जाने दो वो देखो उजाले छाने को हैं
सूरज की सुनहरी किरनों के ख़ामोश बुलावे आने को हैं
मजीद अमजद
नज़्म
अब शाम-ए-ज़िंदगी की ज़ुल्मत है छाने वाली
वो सुब्ह-ए-दिल-कुशा का नज़्ज़ारा फिर दिखा दे