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नज़्म
रंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौत
मोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कुछ झड़पें बीन रबाबों की कुछ सारंगी और चंग बजी
कुछ तार तम्बूरों के झनके, कुछ ढमढी और मुँह-चंग बजी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
औरतें बेचेंगी जब स्टेज पर बा-रक़्स-ओ-चंग
अपनी आँखों की लगावट अपने रुख़्सारों का रंग
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ख़ामोश हैं ये ख़ामोशी से, सो बरबत-ओ-चंग बनाते हैं
तारों में राग सुलाते हैं, तब्लों में बोल छुपाते हैं
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
ख़ालिद मुबश्शिर
नज़्म
यहाँ पे ढूँढते रहोगे ये ख़्वाब कोई नहीं मिलेगा
यहाँ पे शेर ओ शराब ओ चंग ओ रुबाब कोई नहीं मिलेगा
सज्जाद बाक़र रिज़वी
नज़्म
चश्मे उबल रहे हैं नहरें शबाब पर हैं
नग़्मात-ए-नौजवानी चंग-ओ-रुबाब पर हैं