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नज़्म
पर-ए-पर्वाज़ तख़य्युल ख़्वाबीदा
तसव्वुर बेदार
चश्म-ए-नर्गिस निगराँ
चश्म-ए-फ़ुसूँ-गर बीमार
सईदुल ज़फर चुग़ताई
नज़्म
आज भी अश्क-ए-ख़ूँ मिरा क़श्क़ा जबीन-ए-नाज़ का
आज भी ख़ाक-ए-दिल मिरी सुरमा-ए-चश्म-ए-गुल-रुख़ाँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हफ़ीज़ बनारसी
नज़्म
बिजली थी चमकती हुई दामान-ए-शफ़क़ में
या मौज-ए-तबस्सुम थी लबों में जो निहाँ थी
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
महकी हुई साँसें मिरी साँसों में समो दे
सहबा-ए-शफ़क़-रंग की मस्ती में डुबो दे
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
नज़्म
चश्म-ए-हक़-बीं के लिए इबरत के नज़्ज़ारे मिले
हस्ती-ए-इंसान पे जो ज़िंदगानी देख कर
मयकश अकबराबादी
नज़्म
आँख के मुबहम इशारे से बुलाती है मुझे
एक पुर-असरार इशरत का ख़ज़ाना है वो चश्म-ए-दिल-नशीं
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
चश्म-ए-ज़ाहिर-बीं समझती है कि बस वो मर गए
दर-हक़ीक़त मौत को फ़ानी वो साबित कर गए
तिलोकचंद महरूम
नज़्म
यूँ है इक रौशन नमी सी चश्म-ए-सेहर-अंदाज़ में
सुब्ह को शबनम हो जैसे मअरिज़-ए-परवाज़ में
जोश मलीहाबादी
नज़्म
सज़ा-ए-ख़्वेश है ख़ुद सत्ह-ए-चश्म-ए-ज़ाहिर में
जिसे मआ'नी-ए-शाइ'र पे ए'तिबार नहीं