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नज़्म
इस से बद-तर लत नहीं है कोई ये लत छोड़िए
रोज़ अख़बारों में छपता है कि रिश्वत छोड़िए
जोश मलीहाबादी
नज़्म
तो जब तक आसमानों और हमारे दरमियाँ हाइल
हुजूम-ए-क़ातिलाँ छटता नहीं हटता नहीं पर्दा
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
जाने वाले कल में हम ने दुख की फ़स्ल को काटा
बस्ती बस्ती भूक इफ़्लास की उड़ती ख़ाक को चाटा
सरफ़राज़ सय्यद
नज़्म
पाँचवाँ है और छटा है और पतंगें और डोर
सातवाँ है, आठवाँ है और नवाँ करते हैं ज़ोर