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नज़्म
घर-बार अटारी चौपारी क्या ख़ासा नैन-सुख और मलमल
चलवन पर्दे फ़र्श नए क्या लाल पलंग और रंग-महल
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
कहाँ गया वो ज़माना कि जिस की याद में आज
भुलाए बैठा हूँ ख़ुद को पता नहीं मिलता
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
चमन में नाज़ से अठखेलियाँ करती बहार आई
गुलों का पैरहन पहने वो जान-ए-इंतिज़ार आई
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
अभी कुछ दिन मुझे इस शहर में आवारा रहना है
कि अब तक दिल को उस बस्ती की शामें याद आती हैं
चाैधरी मोहम्मद नईम
नज़्म
यूँ आए हैं घिर घिर के ये दुख-दर्द के बादल
तारीक फ़ज़ाओं में घुला जैसे हो काजल
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
क्या नग़्मा-हा-ए-कैफ़ का दरिया बहा गया
ख़ुद हुस्न को जहाँ में हसीं-तर बना गया