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नज़्म
कि इक ख़रगोश को कैसे उठाया जाए कानों से पकड़ कर
कि इक बिल्ली के बच्चे को अगर हम छेड़ना चाहें
शारिक़ कैफ़ी
नज़्म
वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
सुनो तन्हा चलना खेल नहीं, चलो आओ मिरे हम-राह चलो
चलो नए सफ़र पर चलते हैं, चलो मुझे बना के गवाह चलो
साक़ी फ़ारुक़ी
नज़्म
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
नादान हैं वो जो छेड़ते हैं इस आलम में नादानों को
उस शख़्स से एक जवाब मिला सब अपनों को बेगानों को
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
क्या लौंडी बांदी दाई दवा क्या बंदा चेला नेक-चलन
क्या मंदर मस्जिद ताल कुआँ क्या खेती बाड़ी फूल चमन
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तू ने क्या देखा नहीं मग़रिब का जमहूरी निज़ाम
चेहरा रौशन अंदरूँ चंगेज़ से तारीक-तर