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नज़्म
मेरे मन के छेड़ने को मुझ से वो बैठेंगे दूर
मैं जो उलझूंगी तो पीतम मुस्कुराएँगे ज़रूर
मयकश अकबराबादी
नज़्म
वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा