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नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
या छोड़ें या तकमील करें ये इश्क़ है या अफ़साना है
ये कैसा गोरख-धंदा है ये कैसा ताना-बाना है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
नादान हैं वो जो छेड़ते हैं इस आलम में नादानों को
उस शख़्स से एक जवाब मिला सब अपनों को बेगानों को
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
जग के चारों कूट में घूमा सैलानी हैराँ हो कर
इस बस्ती के इस कूचे के इस आँगन में ऐसा चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
जो राग छेड़ती झुँझला के भी मोहब्बत का
वो माँ कि घुड़कियाँ भी जिस के गीत बन जाएँ