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नज़्म
मुझ को पूछा था मुझे ढूँडा था चारों जानिब?
उस ने इक लम्हे को देखा मुझे और फिर हँस दी
परवीन शाकिर
नज़्म
जिस दिन से मिले हैं दोनों का सब चैन गया आराम गया
चेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गया
अख़्तर शीरानी
नज़्म
या छोड़ें या तकमील करें ये इश्क़ है या अफ़साना है
ये कैसा गोरख-धंदा है ये कैसा ताना-बाना है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
नादान हैं वो जो छेड़ते हैं इस आलम में नादानों को
उस शख़्स से एक जवाब मिला सब अपनों को बेगानों को