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नज़्म
ख़ास तरह की सोच थी जिस में सीधी बात गँवा दी
छोटे छोटे वहमों ही में सारी उम्र बिता दी
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
मुझे था छोटे बड़ों से बहुत शदीद लगाव
हर एक पर मैं छिड़कता था अपनी नन्ही सी जाँ
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
दाम इक छोटे से कूज़े के हैं सौ जाम-ए-बिलूर
मोल लेने जाएँ इक क़तरा तो दें नहर-ओ-क़ुसूर
जोश मलीहाबादी
नज़्म
दिल ऐश-ओ-तरब में पलता हो तब देख बहारें जाड़े की
हो फ़र्श बिछा ग़ालीचों का और पर्दे छोटे हों आ कर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
फिर भी जाने किस तरह शीर-ओ-शकर थे हम
हमारी छोटी छोटी ख़्वाहिशें हर तौर हम-आहंग थीं इतनी
इशरत आफ़रीं
नज़्म
छोटे से ये बच्चे हैं और इतनी बड़ी लकड़ी
शैतान की ये ख़ाला हाथों में है क्यूँ पकड़ी