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नज़्म
गूँजती रहती हैं तुम्हारी सरगोशियाँ मेरे कानों में
बिस्तर की सिलवटें मुँह चिढ़ाने लगती हैं
वर्षा गोरछिया
नज़्म
मैं अपने शहर-ए-तसव्वुर में कितने 'ऐश से था
यहाँ भी तल्ख़ हक़ीक़त मुझे चिढ़ाने लगी
बालमोहन पांडेय
नज़्म
मिरी मजबूरियाँ काफ़ी नहीं क्या मुँह चिढ़ाने को
जो तू भी मुँह चिढ़ाता और मेरी जान खाता है
तालिब चकवाली
नज़्म
जीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बाएँ डूब गईं
इंसान की क़िस्मत गिरने लगी अजनास के भाव चढ़ने लगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
वो बचपना जिसे बर्दाश्त अपनी मुश्किल हो
वो बचपना जो ख़ुद अपनी ही तेवरियाँ सी चढ़ाए
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
कोई रग वाहिमा-ए-दर्द से चिल्लाने लगे
और क़ज़्ज़ाक़-ए-सिनाँ-दस्त का धुँदला साया