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नज़्म
ठुमरी की रसीली तानों से नग़्मों की घटाएँ आती हैं
छिड़ता है सितार अब भी जो कहीं ख़ुसरव की सदाएँ आई हैं
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
कभी छिड़ता है गर मज़कूर, क़ौमों की जहालत का
तो सब से पहले कानों में तुम्हारा नाम आता है
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
कभी छिड़ता है गर मज़कूर क़ौमों की जहालत का
तो सब से पहले कानों में तुम्हारा नाम आता है
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
उम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैं
और महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जी चाहता है इक दूसरे को यूँ आठ पहर हम याद करें
आँखों में बसाएँ ख़्वाबों को और दिल में ख़याल आबाद करें
अख़्तर शीरानी
नज़्म
क्या रात थी वो जी चाहता है उस रात पे लिक्खें अफ़साना
इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना