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नज़्म
पचास को वो क्रॉस कर के कुछ और ख़ूँ-ख़्वार हो गई है
अगर उसे आंटी कहो तो निगाह में हस्पताल रखना
खालिद इरफ़ान
नज़्म
काले कोस ग़म-ए-उल्फ़त के और मैं नान-ए-शबीना-जू
कभी चमन-ज़ारों में उलझा और कभी गंदुम की बू
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
'इक़बाल' और 'टैगोर' से शाइ'र पी-सी-रे से फ़ाज़िल
वी-सी-रामन शाह सुलैमाँ जे-सी-बोस से कामिल
मोहम्मद शफ़ीउद्दीन नय्यर
नज़्म
लड़की इस्केयर-क्रो हो गई शायद दूल्हा के भाइयों के खेतों में
अच्छा है दर-बदरी होने से तो बच रही