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नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
हाँ अभी बाक़ी है कुछ कुछ ज़ेहन-ओ-दिल पर इख़्तियार
हाँ अभी दुनिया-ए-ज़ब्त-ए-शौक़ का हूँ शहरयार
नख़्शब जार्चवि
नज़्म
दवा-ए-दर्द-ए-दिल के तुम न मिन्नत-कश हुए चूँकि
तुम्हारे 'इश्क़ में तुम पर रही अपनी ख़ुदी ग़ालिब
हसन नवाब हसन
नज़्म
निगार-ए-शाम-ए-ग़म मैं तुझ से रुख़्सत होने आया हूँ
गले मिल ले कि यूँ मिलने की नौबत फिर न आएगी