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नज़्म
कितने ही हम से रूप के रसिया आए यहाँ और चल भी दिए
तुम हो कि इतने हुस्न के होते एक न दामन थाम सके
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ऐ कि तू इक जौहर-ए-तेग़-ए-दिल-ए-इस्लाम थी
तेरी हस्ती यादगार-ए-रौनक़-ए-अय्याम थी
बिलक़ीस जमाल बरेलवी
नज़्म
कुफ्र-ओ-इस्लाम का इस के नहीं खुलता 'उक़्दा
हाथ में सुब्हा भी है दोष पे ज़ुन्नार भी है
वहीदुद्दीन सलीम
नज़्म
जो मिरी बात समझता वो सुख़न-दाँ न मिला
कुफ़्र ओ इस्लाम की ख़ल्वत में भी जल्वत में भी