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नज़्म
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
हर दासी के गीले बदन से उस की रूह भाप बन कर उड़ जाती
ला-ज़वाल क़ुर्बानी ख़ुदा क़ुबूल करता है
फ़ैसल सईद ज़िरग़ाम
नज़्म
तुम्हें मालूम है उर्दू जो है पाली से निकली है
वो गोया उस की ही इक पुर-नुमू डाली से निकली है