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नज़्म
जिसे दबाने के ब'अद उस को ग़द्र कहने लगे
ये अहल-ए-हिन्द भी होते हैं किस क़दर मासूम
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
कुछ भीगी तानें होली की कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग-भरे
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
स्याह-ख़ाना-ए-दुनिया की ज़ुल्मतें हैं दो-रंग
निहाँ है सुब्ह-ए-असीरी में शाम-ए-आज़ादी