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नज़्म
डबडबा आती थीं आँखें कोई हँसता था अगर
थी नशात-ए-ज़िंदगी मेरी नज़र में पुर-ख़तर
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
तकब्बुर ज़ाविए बनता हुआ गुफ़्तार की लौ में
हज़ारों ख़ुसरुओं का दबदबा रफ़्तार की रो में
शोरिश काश्मीरी
नज़्म
बेवफ़ा तुम को जो कह देता था झुंझलाहट में
डबडबा आती थीं अश्कों से वो आँखें मख़मूर
सफ़दर आह सीतापुरी
नज़्म
'इशक़-ओ-मस्ती हमा-तन दबदबा-हा-ए-महमूद
पाक है अस्वद-ओ-अह्मर से शबिस्तान-ए-वजूद
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
वो दोशीज़ा भी शायद दास्तानों की हो दिल-दादा
उसे मालूम होगा 'ज़ाल' था 'सोहराब' का दादा
जौन एलिया
नज़्म
मेरे माज़ी को अंधेरे में दबा रहने दो
मेरा माज़ी मिरी ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
उसी ज़माने में कहते हैं मेरे दादा ने
जब अर्ज़-ए-हिन्द सिंची ख़ून से ''सपूतों'' के