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नज़्म
दर्स-गाहें थीं प अंग्रेज़ी पढ़े बाबू न थे
दफ़्तरी गाड़ी चलाने के लिए याबू न थे
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
हमारे लिए जीत का शादियाना बजाया नहीं
किस लिए दफ़्तरों में हमारी ज़मीं पर गुल-ए-मेहरबानी
इरफ़ान शहूद
नज़्म
दफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयात
थी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुला
वा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुला
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
यादों के बे-म'अनी दफ़्तर ख़्वाबों के अफ़्सुर्दा शहाब
सब के सब ख़ामोश ज़बाँ से कहते हैं ऐ ख़ाना-ख़राब
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
मैं कितना अपने दफ़्तर में हूँ कितना घर की ख़ल्वत में
वो मुझ को मुझ पे ही तक़्सीम कर के देखती होगी
अब्बास ताबिश
नज़्म
मुसहफ़-ए-रू-ए-किताबी रू-कश-ए-नाज़-ए-गुलाब
और बन जाए ये नेमत दफ़्तर-ए-इल्म-ए-हिसाब