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नज़्म
तुम चाहो तो बस्ती छोड़े तुम चाहो तो दश्त बसाए
ऐ मतवालो नाक़ों वालो वर्ना इक दिन ये होगा
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
दिल में इक वक़्त-ए-तरब-नाक का अरमान लिए
ख़ुद को यूँ वक़्फ़-ए-ग़म-ओ-गर्दिश-ए-हालात न कर
फ़रीद इशरती
नज़्म
लेकिन ऐ मरकज़-ए-तहज़ीब-ओ-तमद्दुन मुझ को
यूँ कोई फ़िक्र-ओ-ग़म-ए-तल्ख़ी-ए-हालात नहीं