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नज़्म
ज़ुबैर अली ताबिश
नज़्म
'इंशा' जी इन चाहने वाली देखने वाली आँखों ने
मुल्कों मुल्कों शहरों शहरों कैसा कैसा देखा चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ख़ामोशी मेरी साथी है और देखने वाला कोई नहीं
ऐ काश कहीं से आ जाते जीने का बहाना कोई नहीं