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नज़्म
ख़्वार हुए दमड़ी के पीछे और कभी झोली-भर माल
ऐसे छोड़ के उट्ठे जैसे छुआ तो कर देगा कंगाल
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
दफ़्न कर देगा जो ख़ालिक़ को भी मख़्लूक़ समेत
और ये आबादियाँ बन जाएँगी फिर रेत ही रेत
अहमद फ़राज़
नज़्म
कौन पोंछेगा मिरे बहते हुए अश्कों की धार
कौन पानी पढ़ के देगा होगा जब मुझ को बुख़ार