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नज़्म
और ख़ाकिस्तर से आप अपना जहाँ पैदा करे
ज़िंदगी की क़ूव्वत-ए-पिन्हाँ को कर दे आश्कार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
शाम को जब अपनी ग़म-गाहों से दुज़्दाना निकल आते हैं हम?
या ज़वाल-ए-उम्र का देव-ए-सुबुक-पा रू-ब-रू
नून मीम राशिद
नज़्म
जहाँ तक देख सकता हूँ अँधेरा ही अँधेरा है
मगर मैं अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ता ही जाता हूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
एक जिस्म-ए-ना-तवाँ इतनी दबाओं का हुजूम
इक चराग़-ए-सुब्ह और इतनी हवाओं का हुजूम