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नज़्म
कुछ देर हक़ीक़त को छुपाया भी तो फिर क्या
झूटों ने जो सच्चों को चढ़ाया भी तो फिर क्या
इस्माइल मेरठी
नज़्म
देख हैजान से लर्ज़ां हैं ये आरिज़ की रगें
आज उस जिन्स-ए-गिराँ-बार को अर्ज़ां कर लें
अख़्तर पयामी
नज़्म
माँ ने बच्चे को ये समझाया बहुत देर तलक
ऐ नए साल तिरे जश्न-ए-तरब का मतलब