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नज़्म
शाम को जब अपनी ग़म-गाहों से दुज़्दाना निकल आते हैं हम?
या ज़वाल-ए-उम्र का देव-ए-सुबुक-पा रू-ब-रू
नून मीम राशिद
नज़्म
फ़ज़ा में शोला-अफ़्शाँ देव-ए-इस्तिब्दाद का ख़ंजर
सियासत की सनानें अहल-ए-ज़र के ख़ूँ-चकाँ तेवर
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
कुकड़ूँ कूँ की तान लगा के मुर्ग़ा गाय ख़याल
क़ुमरी अपनी ठुमरी गाय मुर्ग़ी देवे ताल
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
शहर की सब से बड़ी होटल की छत को छू न सकने से ख़फ़ीफ़
ना-बलद टख़नों की कमज़ोरी से देव-ए-अस्र की
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
ये कमज़ोरों की आबादी में ताक़त की ‘अमल-दारी
रहेगा देव-ए-इस्तिब्दाद का सिक्का रवाँ कब तक