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नज़्म
शाइस्ता हबीब
नज़्म
कुछ ऐसा रोब हुआ क़ाएम सब उन के जिलौ में भागे थे
हम जैसे भी उन के मल्बूसात में कच्चे-पक्के धागे थे
जमीलुद्दीन आली
नज़्म
मैं ने जाना है कि लफ़्ज़ों के तिलिस्मी धागे
कैसे तारीख़ को उन्वान नए देते हैं
अम्बरीन सलाहुद्दीन
नज़्म
और उन से धागे ले कर ख़ुद को बुनती हूँ
मैं रौशनी नहीं मगर मैं तारीकी भी नहीं