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नज़्म
ख़्वाब-गह शाहों की है ये मंज़िल-ए-हसरत-फ़ज़ा
दीदा-ए-इबरत ख़िराज-ए-अश्क-ए-गुल-गूँ कर अदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
है जहान-ए-गुज़राँ ख़्वाब का बिल्कुल नक़्शा
दीदा-ए-हज़रत-ए-इंसाँ के लिए धोका सा
सूरज नारायण मेहर
नज़्म
जलाए... दीदा-ए-बे-ख़्वाब की हर राह दरवाज़े
की दर्ज़ों से निकालेगा... ख़ुदा की मेहरबानी इक
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
दीदा-ए-पुर-ख़ूँ से कासा तक की मंज़िल का बयाँ
ज़िंदगानी में हज़ारों बार मर जाने की बात
शाज़ तमकनत
नज़्म
कलियाँ बे-ज़ार हैं शबनम के तलव्वुन से मगर
तू ने इस दीदा-ए-पुर-नम को तो देखा होता